‘भारत’ की बात सुनाता हूँ।

मैं जगत हूँ और आज ‘भारत’ की बात सुनाता हूँ।

पिछले हफ्ते हम लोग अमरिका के सफर पर थे, अमरिका का वाशिंगटन डीसी भारत से करीब 7700 से भी अधिक माईल दूरी पर बसा है।

अमरिका के बफेलो शहर से वाशिंगटन के डल्स एयरपोर्ट पर यूनाइटेड एयरलाइन का हमारा हवाई जहाज लैंड करता है।

हमारी अमरिका सफर का यह तीसरा नया शहर हम लोग देखने वाले थे। यह शहर देखने के लिए काफी उत्सुक थे क्योंकि यहां के वाइट हाउस, वॉशिंगटन मॉन्यूमेंट,आइंस्टाइन-लूथर किंग या फिर अब्राहम लिंकन के मेमोरियलस और म्यूजियमस के बारे में हम लोगों ने काफी सालों से पढ़ रखा था। जी हां, पर    आज बात उनके बारे में नहीं करनी है,            

आज मैं आपको ‘भारत’ की बात सुनाता हूँ।

हवाई जहाज से उतरते ही हमने अपनी कैब बुक की। कैब के ड्राइवर अपने निर्धारित समय पर अपने लोकेशन पर आ गए और हमें अपना सामान कार की डिक्की में रखने में सहायता की और फिर हमने शुरुआत की अगले तकरीबन एक घंटे के सफर की, जो की हमें एयरपोर्ट से डि.सी. डाउनटाउन में स्थित होटल तक ले जाने वाली थी।

“हाय, होप यु हेव अ गुड डे!” के अभिवादन से हमारे वार्तालाप की शुरुआत होती है। बेहद सौम्यता और शालीनता से बातचीत  करते सज्जन ने हम दोनों का ध्यान आकर्षित पहले ही कर लिया था।

शुरुआत में ही हमने पूछ लिया, “मान्यवर! आप कहाँ से हो…!?” उन्होंने भी सीधा सीधा जवाब देने के बदले हमें पूछा कि थोड़ी देर बात करते हैं और आप ही बताना की मैं आपको कहाँ से लग रहा हूँ!?

हमने भी लगभग तीसरे ही प्रयास में सही अनुमान लगा लिया था –  वे श्रीमान पर्शिया से थे। हमारी भारतीय पहचान उन्होंने भी सहजता से समझ ली थी।

बातों का सिलसिला आगे बढ़ता है और हमें पता चलता है की वे अभी अपने परिवार के साथ रिटायर्ड लाइफ जी रहे है। एक्टिव लाइफ के दौरान फॉरेन सर्विस में कार्यरत थे और दुनिया के दश से भी ज्यादा देशों में घूम चुके थे।

हमारे लिए सबसे बड़ा सुखद आश्चर्य तब था जब उन्होंने यह बात बताई कि वे भारत भी दो साल से अधिक रह चुके हैं और उनकी बड़ी बेटी का जन्म भी मुंबई के एक अस्पताल में हुआ था। उनकी बातचीत में जिक्र हुआ नरीमन प्वाइंट में उस समय फॉरेन सर्विस के उनके कार्यालय से लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री कार्यालय तक के सफर का। वे अपने भूतकाल की सुनहरी यादें बया कर रहे थे और उन शब्दों में हम अपने ‘अजराअमर’ भारत की भव्यता सुनकर गौरवान्वित हो रहे थे।

जब वे भारत के बारे में हमें बता रहे थे तब उनके भावों में प्रकट हो रही ‘आत्मीयता’ शायद शब्दों में पूर्णतया बयान करना असंभव होगा।

हमने भी भारत की ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’
भावना को उजागर करते हुए किस तरह सर्वप्रथम बार पर्शियन भारत में आए और ‘दूध में शक्कर’ मिल जाए उस तरीके से भारतीय समाज में घुलमिल गए और आधुनिक भारत निर्माणमें योगदान देते रहे है उसका जिक्र किया।

वोह कहते है ना की “साधारण दिखने वाले लोग ही दुनिया के सबसे अच्छे लोग होते हैं” – शायद यह सिर्फ कहने की बात नही, हम ऐसे लोगों को अक्सर मिलते भी है और वे ही हमारे जीवन के सफर को बेहतर बनाते है।

-जगत अवाशिया

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नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम्।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते।।
🙏

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