रूहानी “रंगत”

कहीं सुहाना मंज़र यूँ भी तो हो
किसी गगन तले, शाम सुनहरी हो
शिकारों से लिपटा मनमोहक झील हो
श्वेत वस्त्रावृत्त हिम शिखरों को
निहालता कोई प्यारा सा साथ हो |

कहीं सुहाना मंज़र यूँ भी तो हो
ध्यानस्थ जिव हो और सामने
आदि शंकर शिव हो
ईमान भी हो, इबादत भी हो, अजान भी हो
संध्या पूजा भी हो भजन की गूँज भी हो
मेरी आयत भी यही, मेरे अध्याय भी यही
बस यहाँ इंसानियत हो, इंसानियत हो, इंसानियत हो |

रहमत भी हो, बरकत भी हो
कृपा और दुआ में हरकोई नत मस्तक हो

मेरी इन वादियों में –

अमन और प्रेम से महकता गुलिस्तां हरदम हो,
अमन और प्रेम से महकता गुलिस्तां हरदम हो,
अमन और प्रेम से महकता गुलिस्तां हरदम हो

  • जगत निरुपम *** कुदरत की इस रूहानी “रंगत” को समर्पित |

१८/०२/२०२१

श्रीनगर, जम्मू कश्मीर, भारत |

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