जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां है ??

ये कूचे ये नीलामघर दिलक़शी के

ये लुटते हुए कारवां ज़िंदगी के

कहां हैं कहां हैं मुहाफ़िज़ ख़ुदी के

जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां है.

ये पुरपेंच गलियां ये बेख़्वाब बाज़ार

ये गुमनाम राही ये सिक्कों की झंकार

ये इस्मत के सौदे ये सौदों पे तकरार

जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां है.

तअफ्फुन से पुरनीम रौशन ये गलियां

ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियां

ये बिकती हुई खोखली रंगरलियां

जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां है.

वो उजले दरीचों में पायल की छनछन

तऩफ्फ़ुस की उलझन पे तबले की धनधन

ये बेरूह कमरों में खांसी की धनधन

जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां है.

ये गूंजे हुए कहकहे रास्तों पर

ये चारों तरफ भीड़ सी खिड़कियों पर

ये आवाज़ें खिंचते हुए आंचलों पर

जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां है.

ये फूलों के गजरे ये पीकों के छींटे

ये बेबाक़ नज़रें ये गुस्ताख़ फ़िक़रे

ये ढलके बदन और ये मदक़ूक़ चेहरे

जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां है.

ये भूखी निगाहें हसीनों की जानिब

ये बढ़ते हुए हाथ सीनों की जानिब

लपकते हुए पांव ज़ीनों की जानिब

जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां है.

यहां पीर भी आ चुके हैं जवां भी

तनूमंद बेटे भी अब्बा मियां भी

ये बीवी भी है और बहन भी है मां भी

जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां है.

मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी

यशोदा की हमजिंस राधा की बेटी

पयंबर की उम्मत ज़ुलेख़ा की बेटी

जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां है.

ज़रा मुल्क़ के रहबरों को बुलाओ

ये कूचे ये गलियां ये मंज़र दिखाओ

सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ को लाओ

जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां है.

– साहिर लुधियानवी

 

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